Sunday, 4 December 2011

भगवती शांता परम सर्ग-2 : शिशु - शांता

जन्म-कथा 
कौशल्या भयभीत हो, ताके संबल एक |
रक्षा होवे भ्रूण की,  दीखे शत्रु  अनेक ||

चारों  दिशा  उदास  हैं,  फैला  है आतंक |
जिम्मेदारी कौन ले,   मारे  दुश्मन  डंक || 

सारे देवी-देवता, चिंतित रही मनाय |
चार दिनों से अनमयस्क, बैठे मन्दिर जाय  ||

जीवमातृका  वन्दना, माता  के  सम पाल |
जीवमंदिरों को सुगढ़, रखती सदा संभाल ||
http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/6/61/Stone_sculpt_NMND_-20.JPG 
शिव और जीवमातृका
धनदा  नन्दा   मंगला,   मातु   कुमारी  रूप |
बिमला पद्मा वला सी, महिमा अमिट-अनूप ||

माता  करिए  तो  कृपा, करूँ तोर अभिषेक  |
 शत्रु दृष्टि से ले बचा, बच्चा अपना नेक ||

 संध्या को रनिवास में, रानी रह-रह रोय |
उच्छवासें भरती रही, अँसुवन बदन भिगोय ||

दशरथ को दरबार में, हुई घरी भर देर |
कौशल्या ना दीखती, अन्दर घुप्प-अंधेर ||

तभी सुबकने की पड़ी, कानों में आवाज |
दासी को आवाज दे, पूँछें दशरथ राज ||

हुआ उजाला कक्ष में, मुखड़ा लिए मलीन |
रानी लेटी भूमि पर, लागे अति गमगीन ||
mashraqi-dulhan
राजा विह्वल हो गए, संग भूमि पर बैठ |
रानी को पुचकारते, सत्य प्रेम की पैठ ||

 बोलो रानी बेधड़क, खोलो मन के राज |
 कौन रुलाया है तुम्हें, करे कौन नाराज ??


निकले अगर भडास तो, बढती जीवन साँस |

आँसू बह जाएँ अगर,  कमे   दर्द-एहसास ||

मद्धिम स्वर फिर फूटता, हिचकी होती तेज |
अपने बच्चे को भला, कैसे रखूं सहेज ||

राजा सुनकर हर्ष से, रानी को लिपटाय |
कहते चिंता मत करो, करूं सटीक उपाय ||

अगली प्रात: वे गए, गुरु वशिष्ठ के पास |
थे सुमंत भी साथ में, मंत्री सबसे ख़ास ||

बनी योजना इस तरह, दुश्मन धोखा खाय ||
रानी के इस गर्भ को, राखे नजर बचाय ||

अगले दिन दरबार में, आया इक सन्देश |
कौशल्या की मातु को, पीड़ा स्वास्थ-कलेस ||

डोली सजकर हो गई, कौल भी तैयार |
छद्म वेश में सेविका, बैठी अति-हुशियार ||


वक्षस्थल पर झूलता, वही पुराना हार |
जिसको लेकर था भगा, सुग्गासुर अय्यार ||

सेना के संग हो विदा, डोली चलती जाय |
गिद्धराज ऊपर उड़े, पंखों को फैलाय ||


WEDDING BRIDAL PALKI
अभिमंत्रित कर महल को, कौशल्या के पास |
कड़ी सुरक्षा में रखा, दास-दासियाँ ख़ास ||

खर-दूषण के गुप्तचर, छोड़े अपनी खोह |
डोली के पीछे लगे, लेने को तब टोह ||

छद्म-वेश में माइके, धर कौशल्या रूप |
रानी हित दासी करे, अभिनय सहज अनूप ||

वर्षा-ऋतु फिर आ गई, सरयू बड़ी अथाह |
दासी उत्तर में रही, दक्षिण में उत्साह ||




देख सकें औलाद को, हुई बलवती चाह |
दशरथ  सबपर  रख  रहे, चौकस कड़ी निगाह ||

सात मास बीते मगर, गोद-भराई भूल |
कनक महल रक्षित रहा, रानी के अनुकूल ||

नवरात्रि के पर्व में, परजा में उल्लास |
कौशल्या कर न सकी, पर अबकी उपवास ||
शरद पूर्णिमा बीतती, अमृत वर्षा होय |
रानी आँगन में जमी, काया रही भिगोय ||

धीरे धीरे सर्दियाँ , रही धरा को घेर |
शीत लहर चलने लगी, यादें रही उकेर ||

पीड़ा झूठे प्रसव की, होंठ रखे  वो भींच |
रानी सिसकारी भरे, जान न पावे नींच ||
 
रानी हर दिन टहलती, करती  नित व्यायाम |
पौष्टिक भोजन खाय के, करे तनिक आराम ||
कोसलपुर में उस तरफ, दासी का वह खेल |
खर-दूषण का गुप्तचर, रहा व्यर्थ ही झेल ||

शुक्ल फाल्गुन पंचमी, मद्धिम बहे बयार |
सूर्यदेव सिर पर जमे, ईश्वर का आभार ||

पुत्री आई महल में, कौशल्या की गोद |
राज्य ख़ुशी से झूमता, छाये मंगल-मोद ||

एक पाख के बाद में, खबर पाय दश-शीस |
खर दूषण को डांटता, सुग्गा सुर पर रीस ||

कन्या के इस जन्म से, रावण पाता चैन |
चेतो क्षत्रपगण सभी, निकसे तीखे बैन || 

छठियारी में सब जमे, पावें सभी इनाम |
स्वर्ण हार पाए वहां, दासी का शुभ काम ||

गिद्धराज गिद्धौर को, कर दशरथ का काम |
सम्पाती से जा मिले, होते शोध तमाम ||


नई-नई दूरबीन से, देख सकें अति दूर |
प्रक्षेपित कर यान को, भेजें देश सुदूर ||

मालिश करने के लिए, पहुंची कौला धाय |
छूते ही इक पैर को, कन्या खुब अकुलाय ||
कौशल्या ने वैद्य को, आखिर लिया बुलाय |
जांच परख के बाद में, वैद्य रहा सकुचाय ||

एक पैर में दोष है, कन्या होय अपंग |
सुनकर कडुवे वचन को,  कौशल्या थी दंग ||
सम गोत्रीय विवाह
फटा कलेजा भूप का, सुना शब्द विकलांग |
ठीक करो मम संतती, जो चाहे सो मांग ||

भूपति की चिंता बढ़ी, छठी दिवस से बोझ |
तनया की विकृति भला, कैसे होगी सोझ ||

रात-रात भर देखते, उसकी दुखती टांग |
सपने में भी आ जमे, नटनी करती स्वांग ||

गुरु वशिष्ठ ने एक दिन, भेजा भूप बुलाय |
सह सुमंत आश्रम गए, बैठे शीश नवाय ||

सकल जगत के लो बुला, चर्चित वैद्य-हकीम |
सम्मलेन कर लो खुला, बंधन मुक्त असीम ||

कर के दोनों दंडवत, लौटे निज दरबार |
भेजे हरकारे सकल, समझाकर तिथि-वार ||
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नीमसार की भूमि पर, मंडप बड़ा सजाय |
श्रावण की थी पूर्णिमा, रही चांदनी छाय ||

रक्षा बंधन पर्व कर, जमे चिकित्सक वीर |
जांच कुमारी की करें, होता विकल शरीर ||

विषय बहुत ही साफ़ था, वक्ता थे शालीन |
सबका क्रम निश्चित हुआ, हुए कर्म में लीन ||

उदघाटन करने चले, अंग-देश के भूप |
नन्हीं बाला का तभी, देखा सौम्य स्वरूप || 

लगी भली वह बालिका, मुख पर छाया तेज |
पैर धरा पर न पड़े, राखो हृदय सहेज ||

स्वागत भाषण पढ़ करें, राज वैद्य अफ़सोस |
जन्म कथा सारी कही, रहे स्वयं को कोस ||

वक्ताओं ने फिर रखी, वर्षों की निज खोज |
सुबह-सुबह चलती रही, परिचर्चा कुछ रोज ||

दूर दूर से आ रहे, प्रतिदिन विषम मरीज |

शिविरों में नित शाम को, करें बैद्य तजबीज ||

चौथे दिन के सत्र में, बोले वैद्य सुषेन |
गोत्रज व्याहों की विकट, महा विकलता देन ||

राजा रानी अवध के, हैं दोनों गोतीय |
अल्पबुद्धि-विकलांगता, सम दुष्फल नरकीय ||

गुण-सूत्रों की विविधता, बहुत जरूरी चीज |
गोत्रज में कैसे मिलें, रहे व्यर्थ क्यूँ खीज ||

 गोत्रज दुल्हन जनमती, एकल-सूत्री रोग |
 दैहिक सुख की लालसा, बेबस संतति भोग ||

साधु साधु कहने लगे, सब श्रोता विद्वान |
सत्य वचन हैं आपके, बोले वैद्य महान ||

अब तक के वक्ता सकल, करके अति संकोच |
मूल विषय को टाल के, रखें अन्य पर सोच ||

सारे तर्क अकाट्य थे, छाये वहां सुषेन |
भारी वर्षा थम गई, नीचे बैठी फेन ||

आदर से दशरथ कहें, प्रभू दिखाओ राह |
विषम परिस्थिति में हुआ, कौशल्या से ब्याह ||

नहीं चिकित्सा शास्त्र  में, इसका दिखे उपाय |
गोत्रज जोड़ी अनवरत, संतति का सुख खाय ||

व्याख्यान अपना ख़तम, करते वैद्य सुषेन |
  ऋषी बिबंडक खड़े हो, बोले ऐसे बैन ||

एक गोत्र की संतती, झेले अगर विकार |
गोद किसी की दीजिये, सुधरे शुभ आसार ||

प्रभु की इच्छा से मिटें, कुल शारीरिक दोष |
धन्यवाद ज्ञापन हुआ, होती जय जय घोष ||

अंगराज श्री  रोम्पद, आये दशरथ पास |
अभिवादन करके कहें, करिए नहीं निराश ||

रानी इनकी वर्षिणी, कौशल्या की ज्येष्ठ |
चम्पारानी बोलते, परजा मंत्री श्रेष्ठ ||

  ब्याह हुए बारह बरस, सूनी अब भी गोद |
बेटी प्यारी सौंपिए, बाढ़े मंगल-मोद ||

दशरथ अब भी सोच में,  कैसे दे दें गोद |
  दिल को अपने गोद के, करें कसक अनुमोद ??

कौशल्या हामी भरी, करती दिल मजबूत|
 अपनी बहना के लिए, अंग भेजती दूत ||

अंगराज भी खुश हुए, रानी को बुलवाय |
रस्म गोद करके सफल, उनकी गोद भराय ||

अंग-विकृत वो अंगजा, कर ली अंगीकार |

अंगराज दशरथ चले, फिर सुषेन के द्वार ||  

 तब सुषेन के शिविर में, पहुंचे अवध नरेश |
चेहरे पर चिंता बड़ी, चर्चा चली विशेष ||

बोले वैद्य सुषेन जी, सुनिए हे महिपाल |
ऐसी संताने सहें,  बीमारी विकराल ||

 गोत्रज शादी को भले, भरसक दीजे टाल | 
मंजूरी करती खड़े, टेढ़े बड़े सवाल ||

मामा लेवे गोद जो, कर दे कन्या-दान |
उल्टा हाथ गुमाय के, खींचें सीधे कान ||

मिटते दारुण दोष पर, ईश्वर अगर सहाय  |
सबसे उत्तम ब्याह में, दूरी रखो बनाय ||

 गोत्र-प्रांत की भिन्नता, नए नए गुण देत |
बल बुद्धि विद्या प्रबल, साहस रूप समेत ||

सहज रूप से सफल हो, रावण का अभियान |
किया दूर रनिवास से, राजा को यह ज्ञान  ||

आई रानी अंग से,  लाया दूत बुलाय | 
कौशल्या के अंग से, अमृत बहता जाय ||

लगे तीन दिन गोद में, साइत शुभ आसन्न |
नया देश माता नई, हुई रीति संपन्न ||

जन्म-दायिनी छूटती, रोवे बुक्का-फार |
दिल का टुकड़ा सौंप दी, महिमा अपरम्पार ||

आठ माह की उम्र में, बदला घर परिवार |

 अंग देश को चल पड़ी, सरयू अवध विसार ||

कौला कौला सी चली, नव-कन्या के संग |


 जननी आती याद तो, करती कन्या तंग || 

कन्या का नामकरण 

कौशल्या दशरथ कहें, रुको और महराज |
अंगराज सह वर्षिणी, ज्यों चलते रथ साज ||

राज काज का हो रहा, मित्र बड़ा नुक्सान |
चलने की आज्ञा मिले, हमको काल्ह विहान ||

सुबह सुबह दो पालकी, दशरथ की तैयार |
अंगराज  रथ पर हुए, मय परिवार सवार ||

दशरथ विनती कर कहें, देते एक सुझाव |
सरयू  में  तैयार है,  बड़ी राजसी  नाव ||

धारा के संग जाइए, चंगा रहे शरीर |
चार दिनों की यात्रा, काहे होत अधीर ||

चंपानगरी  दूर  है, पूरे  दो सौ  कोस |
उत्तम यह प्रस्ताव है, दिखे नहीं कुछ दोष ||

पहुंचे उत्तम घाट पर, थी विशाल इक नाव |
नाविक-गण सब विधि कुशल, जाने नदी बहाव ||

बैठे सब जन चैन से, नाव बढ़ी अति मंद |
घोड़े-रथ तट पर चले, लेकर सैनिक चंद ||

धीरे धीरे गति बढ़ी, सीमा होती पार |
गंगा में सरयू मिली, संगम का आभार ||
 
चार घरी रूककर वहां, पूजें गंगा माय  |
सरयू को परनाम कर, देते नाव बढ़ाय ||

हर्ष और उल्लास का, देखा फिर अतिरेक |
ग्राम रास्ते में मिला, अंगदेश का एक || 

धरती पर उतरे सभी, आसन लिया जमाय |
नई कुमारी का करें, स्वागत जनगण आय |

लगे कुमारी  खुब प्रसन्न, कौला रखती ख्याल |
धरती पर धरती कदम, रानी रही संभाल ||

वैद्यराज की औषधी, वह गुणकारी लेप |
रस्ते भर मलती चली, तीन बार खुब घेप ||


नई वनस्पति फल नए, शीतल नई समीर |
खान-पान था कुल नया, नई नई तासीर || 

आठ माह की बालिका, मंद-मंद मुसकाय |
कंद-मूल फल प्रेम से, अंगदेश के खाय |

रानी के संग खेलती, बाला भूल कलेश ||
राज काज के काम कुछ, निबटा रहे नरेश |
विषम परिस्थित में अगर, भूले रिश्ते-नात ।  
जिन्दा रहने के लिए, गर करता आघात ।
गर करता आघात, क्षमा उसको कर देते ।
पर उनका क्या मित्र, प्राण जो यूँ ही लेते ।
भरे पेट का शौक, तड़पता प्राणी ताकें ।
दुष्कर्मी बेखौफ, मौज से पाचक फांके ।।
एक अनोखा वाद था,  ग्राम प्रमुख के पास |
बात सौतिया डाह की, विधवा करती नाश ||

सौतेला  इक  पुत्र  है, सौजा  के  दो  आप |
इक खाया कल बाघ ने, करती घोर विलाप  ||

रो रो कर वह बक रही, सौतेले का दोष |
यद्दपि वह घायल पड़ा, बेहद है अफ़सोस ||

ढर्रा बदलेगी नहीं,  रोज अड़ाये टांग ।
खांई में बच्चे सहित, ममता मार छलांग । 
'ममता' मार छलांग, भूलती मानुष माटी ।
धंसी 'मुलायम' भूमि, भागता मार गुलाटी ।
रविकर का अंदाज, लगेगा झटका कर्रा ।
बर्रा प्राकृति दर्प, बदल ना पाए ढर्रा ।।
जान लड़ा कर खुब लड़ा, हुआ किन्तु बेहोश |
बचा लिया इक पुत्र को, फिर भी न संतोष ||

बड़ी दिलेरी से लड़ा, देखा चौकीदार |
बड़े पुत्र को ले भगा, फिर भी वह खूंखार ||

सौजा को विश्वास है, देने को संताप |
सौतेले ने है किया, घृणित दुर्धुश पाप ||

घर न रखना चाहती, वह अब अपने साथ |
ईश्वर की  खातिर अभी, न्याय कीजिए नाथ ||


दालिम को लाया गया, हट्टा-कट्टा वीर |
चेहरे पर थी पीलिमा, घायल बहुत शरीर ||

सौजा से भूपति कहें, दालिम का अपराध |
प्रत्यक्ष निकसे ग्राम से, किन्तु रहे हितसाध ||

दालिम से मुड़कर कहें, जा जहाज में बैठ |
छू ले माता के चरण, बेमतलब मत ऐंठ ||

राजा पक्के पारखी,  है हीरा यह वीर |
पुत्री का रक्षक लगे, कौला की तकदीर ||

ममता में अंधी हुई, अपना पूत दिखाय |
स्वार्थ सिद्ध तृणमूल का, देश भाड़ में जाय |


देश भाड़ में जाय, खाय ले घर का बच्चा |

एक सूत्र जो पाय, चबाती  जाये कच्चा |

देती केंद्र हिलाय, कोप इक क्षण में कमता |
सब नौटंकी आय, चतुर माया से ममता  ।।


सेनापति से यूँ कहें, रुको यहाँ कुछ रोज |
नरभक्षी से त्रस्त जन, करिए उसकी खोज ||

जीव-जंतु जंगल नदी, सागर खेत पहाड़ |
बंदनीय हैं ये सकल, इनको नहीं उजाड़ ||

रक्षा इनकी जो करे, उसकी रक्षा होय |
शोषण गर मानव करे, जाए जल्द बिलोय ||

केवल क्रीडा के लिए, मत करिए आखेट |
भरता शाकाहार भी, मांसाहारी पेट ||

जीव जंतु वे धन्य जो, परहित धरे शरीर |
हैं निकृष्ट वे जानवर, खाएं उनको चीर ||

नरभक्षी के लग चुका, मुँह में मानव खून |
जल्दी उसको मारिये, जनगण पाय सुकून ||

अगली संध्या में करें, रजधानी परवेश |
अंग-अंग प्रमुदित हुआ, झूमा पूरा देश ||

गुरुजन का आशीष ले, मंत्री संग विचार |
नामकरण की शुभ तिथी, तय अगले बुधवार || 

नामकरण के दिन सजा, पूरा नगर विशेष |
ब्रह्मा-विष्णु देखते, नारद उमा महेश ||

महा-पुरोहित कर रहे, थापित महा-गणेश |
राजकुमारी आ गई, आये अतिथि विशेष ||

रानी माँ की गोद में, चंचल रही विराज |
टुकुर टुकुर देखे सकल, इत-उत होते काज ||

कौला दालिम साथ में, राजकुमारी पास |
हम दोनों कुछ ख़ास हैं, करते वे एहसास ||

महापुरोहित बोलते, हो जाओ सब शांत |
शान्ता सुन्दर नाम है, फैले सारे प्रांत ||

शान्ता -शान्ता कह उठा, वहाँ जमा समुदाय |
मात-पिता प्रमुदित हुए, कन्या खूब सुहाय ||

कार्यक्रम सम्पन्न हो, विदा हुए सब लोग |
पूँछे कौला को बुला, राजा पाय सुयोग ||

शान्ता की तुम धाय हो, हमें तुम्हारा ख्याल |
दालिम लगता है भला, रखे तुम्हे खुशहाल ||

तुमको गर अच्छा लगे, दिल में तेरे चाह |
सात दिनों में ही करूँ, तेरा उससे व्याह ||

कौला शरमाई तनिक, गई वहाँ से भाग |
दालिम की किस्मत जगी, बढ़ा राग-अनुराग ||

दोनों की शादी हुई, चले एक ही राह |
शान्ता के प्रिय बन रहे, राजा केर पनाह ||

सौम्या सृष्टी सोहिनी, माँ की मंजिल राह ।
सचुतुर, सुखदा, सुघड़ई, दुर्गे मिली अथाह । 
 दुर्गे मिली अथाह, बड़ी आभारी माता ।
ताकूँ अपना अक्श, कृपा कर सदा विधाता ।
हसरत हर अरमान, सफल देखूं इस दृष्टी ।
मंगल-मंगल प्यार, लुटाती सौम्या सृष्टी ।।

पोर-पोर में प्यार है, ममता अंश असीम ।
दर्शन तुझमे ही करूँ, अपने राम रहीम ।
सर्ग-2 समाप्त  

2 comments:

  1. रामायाण बाचने सा सुख मिल रहा है।
    सुंदर, सरस और भावपूरित प्रस्तुति।

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  2. Dishaa Dason dashaa Dukhi Faelaa Huaa Aatank |
    Bhaarvaar Koun Vare Jab Arind Dase Dank ||

    Ansuvan Nayan Bhigoy..

    Dashrath Raaj Ki Raajsabhaa..

    Tabhi Subakane Ki Padhi Kaanon Men Uchchavaas |
    Kandhan Diye Pukaar Ke Puchen Dashrath Daas ||

    Kholo Man Ke Bhed..
    Koun Kaaran Khed..

    Kar Kaandhan Kahaar..
    Baedhan Hui Taeyyaar..

    Kousalyaa Ke Vaas..
    Kadhi Rakshaa Rakshak Karen Daas Daasiyon Ke Paas

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