width="100"

Thursday 16 June 2011

जिनकी बदौलत दीप यह पलता रहा

ऐसे दीपक को बुझाये क्या हवा -
तूफां में भी जो सदा जलता रहा ।

हृदय-देहरी पर , हथेली ने ढका  
मुश्किलों का दौर यूं  टलता  रहा ।

तेल की बूँदे सदा रिसती रहीं-
अस्थियाँ-चमड़ी-वसा गलता रहा ।

अब अगर ईंधन चुका तो क्या करे 
कब से 'रविकर' तन-बदन तलता रहा ।

खून के वे आखिरी कतरे चुए -
जिनकी बदौलत दीप यह पलता रहा ।।
           (2)
जब यार चार मिल जाते हैं |
तो अपनी ही सदा चलाते हैं ||

दुनिया उनको बुड़बक लगती-
नौ - नौ  त्यौहार  मनाते   हैं ||

मदिरा का गर पान  कर लिया--
अपनी महिमा ही गाते हैं ||

बचिए ऐसे सिर खाऊ से --
ये घर की नाक कटाते हैं  ||

No comments:

Post a Comment