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Sunday, 4 December 2011

भगवती शांता परम सर्ग-2 : शिशु - शांता

जन्म-कथा 
कौशल्या भयभीत हो, ताके संबल एक |
रक्षा होवे भ्रूण की,  दीखे शत्रु  अनेक ||

चारों  दिशा  उदास  हैं,  फैला  है आतंक |
जिम्मेदारी कौन ले,   मारे  दुश्मन  डंक || 

सारे देवी-देवता, चिंतित रही मनाय |
चार दिनों से अनमयस्क, बैठे मन्दिर जाय  ||

जीवमातृका  वन्दना, माता  के  सम पाल |
जीवमंदिरों को सुगढ़, रखती सदा संभाल ||
http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/6/61/Stone_sculpt_NMND_-20.JPG 
शिव और जीवमातृका
धनदा  नन्दा   मंगला,   मातु   कुमारी  रूप |
बिमला पद्मा वला सी, महिमा अमिट-अनूप ||

माता  करिए  तो  कृपा, करूँ तोर अभिषेक  |
 शत्रु दृष्टि से ले बचा, बच्चा अपना नेक ||

 संध्या को रनिवास में, रानी रह-रह रोय |
उच्छवासें भरती रही, अँसुवन बदन भिगोय ||

दशरथ को दरबार में, हुई घरी भर देर |
कौशल्या ना दीखती, अन्दर घुप्प-अंधेर ||

तभी सुबकने की पड़ी, कानों में आवाज |
दासी को आवाज दे, पूँछें दशरथ राज ||

हुआ उजाला कक्ष में, मुखड़ा लिए मलीन |
रानी लेटी भूमि पर, लागे अति गमगीन ||
mashraqi-dulhan
राजा विह्वल हो गए, संग भूमि पर बैठ |
रानी को पुचकारते, सत्य प्रेम की पैठ ||

 बोलो रानी बेधड़क, खोलो मन के राज |
 कौन रुलाया है तुम्हें, करे कौन नाराज ??


निकले अगर भडास तो, बढती जीवन साँस |

आँसू बह जाएँ अगर,  कमे   दर्द-एहसास ||

मद्धिम स्वर फिर फूटता, हिचकी होती तेज |
अपने बच्चे को भला, कैसे रखूं सहेज ||

राजा सुनकर हर्ष से, रानी को लिपटाय |
कहते चिंता मत करो, करूं सटीक उपाय ||

अगली प्रात: वे गए, गुरु वशिष्ठ के पास |
थे सुमंत भी साथ में, मंत्री सबसे ख़ास ||

बनी योजना इस तरह, दुश्मन धोखा खाय ||
रानी के इस गर्भ को, राखे नजर बचाय ||

अगले दिन दरबार में, आया इक सन्देश |
कौशल्या की मातु को, पीड़ा स्वास्थ-कलेस ||

डोली सजकर हो गई, कौल भी तैयार |
छद्म वेश में सेविका, बैठी अति-हुशियार ||


वक्षस्थल पर झूलता, वही पुराना हार |
जिसको लेकर था भगा, सुग्गासुर अय्यार ||

सेना के संग हो विदा, डोली चलती जाय |
गिद्धराज ऊपर उड़े, पंखों को फैलाय ||


WEDDING BRIDAL PALKI
अभिमंत्रित कर महल को, कौशल्या के पास |
कड़ी सुरक्षा में रखा, दास-दासियाँ ख़ास ||

खर-दूषण के गुप्तचर, छोड़े अपनी खोह |
डोली के पीछे लगे, लेने को तब टोह ||

छद्म-वेश में माइके, धर कौशल्या रूप |
रानी हित दासी करे, अभिनय सहज अनूप ||

वर्षा-ऋतु फिर आ गई, सरयू बड़ी अथाह |
दासी उत्तर में रही, दक्षिण में उत्साह ||




देख सकें औलाद को, हुई बलवती चाह |
दशरथ  सबपर  रख  रहे, चौकस कड़ी निगाह ||

सात मास बीते मगर, गोद-भराई भूल |
कनक महल रक्षित रहा, रानी के अनुकूल ||

नवरात्रि के पर्व में, परजा में उल्लास |
कौशल्या कर न सकी, पर अबकी उपवास ||
शरद पूर्णिमा बीतती, अमृत वर्षा होय |
रानी आँगन में जमी, काया रही भिगोय ||

धीरे धीरे सर्दियाँ , रही धरा को घेर |
शीत लहर चलने लगी, यादें रही उकेर ||

पीड़ा झूठे प्रसव की, होंठ रखे  वो भींच |
रानी सिसकारी भरे, जान न पावे नींच ||
 
रानी हर दिन टहलती, करती  नित व्यायाम |
पौष्टिक भोजन खाय के, करे तनिक आराम ||
कोसलपुर में उस तरफ, दासी का वह खेल |
खर-दूषण का गुप्तचर, रहा व्यर्थ ही झेल ||

शुक्ल फाल्गुन पंचमी, मद्धिम बहे बयार |
सूर्यदेव सिर पर जमे, ईश्वर का आभार ||

पुत्री आई महल में, कौशल्या की गोद |
राज्य ख़ुशी से झूमता, छाये मंगल-मोद ||

एक पाख के बाद में, खबर पाय दश-शीस |
खर दूषण को डांटता, सुग्गा सुर पर रीस ||

कन्या के इस जन्म से, रावण पाता चैन |
चेतो क्षत्रपगण सभी, निकसे तीखे बैन || 

छठियारी में सब जमे, पावें सभी इनाम |
स्वर्ण हार पाए वहां, दासी का शुभ काम ||

गिद्धराज गिद्धौर को, कर दशरथ का काम |
सम्पाती से जा मिले, होते शोध तमाम ||


नई-नई दूरबीन से, देख सकें अति दूर |
प्रक्षेपित कर यान को, भेजें देश सुदूर ||

मालिश करने के लिए, पहुंची कौला धाय |
छूते ही इक पैर को, कन्या खुब अकुलाय ||
कौशल्या ने वैद्य को, आखिर लिया बुलाय |
जांच परख के बाद में, वैद्य रहा सकुचाय ||

एक पैर में दोष है, कन्या होय अपंग |
सुनकर कडुवे वचन को,  कौशल्या थी दंग ||
सम गोत्रीय विवाह
फटा कलेजा भूप का, सुना शब्द विकलांग |
ठीक करो मम संतती, जो चाहे सो मांग ||

भूपति की चिंता बढ़ी, छठी दिवस से बोझ |
तनया की विकृति भला, कैसे होगी सोझ ||

रात-रात भर देखते, उसकी दुखती टांग |
सपने में भी आ जमे, नटनी करती स्वांग ||

गुरु वशिष्ठ ने एक दिन, भेजा भूप बुलाय |
सह सुमंत आश्रम गए, बैठे शीश नवाय ||

सकल जगत के लो बुला, चर्चित वैद्य-हकीम |
सम्मलेन कर लो खुला, बंधन मुक्त असीम ||

कर के दोनों दंडवत, लौटे निज दरबार |
भेजे हरकारे सकल, समझाकर तिथि-वार ||
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नीमसार की भूमि पर, मंडप बड़ा सजाय |
श्रावण की थी पूर्णिमा, रही चांदनी छाय ||

रक्षा बंधन पर्व कर, जमे चिकित्सक वीर |
जांच कुमारी की करें, होता विकल शरीर ||

विषय बहुत ही साफ़ था, वक्ता थे शालीन |
सबका क्रम निश्चित हुआ, हुए कर्म में लीन ||

उदघाटन करने चले, अंग-देश के भूप |
नन्हीं बाला का तभी, देखा सौम्य स्वरूप || 

लगी भली वह बालिका, मुख पर छाया तेज |
पैर धरा पर न पड़े, राखो हृदय सहेज ||

स्वागत भाषण पढ़ करें, राज वैद्य अफ़सोस |
जन्म कथा सारी कही, रहे स्वयं को कोस ||

वक्ताओं ने फिर रखी, वर्षों की निज खोज |
सुबह-सुबह चलती रही, परिचर्चा कुछ रोज ||

दूर दूर से आ रहे, प्रतिदिन विषम मरीज |

शिविरों में नित शाम को, करें बैद्य तजबीज ||

चौथे दिन के सत्र में, बोले वैद्य सुषेन |
गोत्रज व्याहों की विकट, महा विकलता देन ||

राजा रानी अवध के, हैं दोनों गोतीय |
अल्पबुद्धि-विकलांगता, सम दुष्फल नरकीय ||

गुण-सूत्रों की विविधता, बहुत जरूरी चीज |
गोत्रज में कैसे मिलें, रहे व्यर्थ क्यूँ खीज ||

 गोत्रज दुल्हन जनमती, एकल-सूत्री रोग |
 दैहिक सुख की लालसा, बेबस संतति भोग ||

साधु साधु कहने लगे, सब श्रोता विद्वान |
सत्य वचन हैं आपके, बोले वैद्य महान ||

अब तक के वक्ता सकल, करके अति संकोच |
मूल विषय को टाल के, रखें अन्य पर सोच ||

सारे तर्क अकाट्य थे, छाये वहां सुषेन |
भारी वर्षा थम गई, नीचे बैठी फेन ||

आदर से दशरथ कहें, प्रभू दिखाओ राह |
विषम परिस्थिति में हुआ, कौशल्या से ब्याह ||

नहीं चिकित्सा शास्त्र  में, इसका दिखे उपाय |
गोत्रज जोड़ी अनवरत, संतति का सुख खाय ||

व्याख्यान अपना ख़तम, करते वैद्य सुषेन |
  ऋषी बिबंडक खड़े हो, बोले ऐसे बैन ||

एक गोत्र की संतती, झेले अगर विकार |
गोद किसी की दीजिये, सुधरे शुभ आसार ||

प्रभु की इच्छा से मिटें, कुल शारीरिक दोष |
धन्यवाद ज्ञापन हुआ, होती जय जय घोष ||

अंगराज श्री  रोम्पद, आये दशरथ पास |
अभिवादन करके कहें, करिए नहीं निराश ||

रानी इनकी वर्षिणी, कौशल्या की ज्येष्ठ |
चम्पारानी बोलते, परजा मंत्री श्रेष्ठ ||

  ब्याह हुए बारह बरस, सूनी अब भी गोद |
बेटी प्यारी सौंपिए, बाढ़े मंगल-मोद ||

दशरथ अब भी सोच में,  कैसे दे दें गोद |
  दिल को अपने गोद के, करें कसक अनुमोद ??

कौशल्या हामी भरी, करती दिल मजबूत|
 अपनी बहना के लिए, अंग भेजती दूत ||

अंगराज भी खुश हुए, रानी को बुलवाय |
रस्म गोद करके सफल, उनकी गोद भराय ||

अंग-विकृत वो अंगजा, कर ली अंगीकार |

अंगराज दशरथ चले, फिर सुषेन के द्वार ||  

 तब सुषेन के शिविर में, पहुंचे अवध नरेश |
चेहरे पर चिंता बड़ी, चर्चा चली विशेष ||

बोले वैद्य सुषेन जी, सुनिए हे महिपाल |
ऐसी संताने सहें,  बीमारी विकराल ||

 गोत्रज शादी को भले, भरसक दीजे टाल | 
मंजूरी करती खड़े, टेढ़े बड़े सवाल ||

मामा लेवे गोद जो, कर दे कन्या-दान |
उल्टा हाथ गुमाय के, खींचें सीधे कान ||

मिटते दारुण दोष पर, ईश्वर अगर सहाय  |
सबसे उत्तम ब्याह में, दूरी रखो बनाय ||

 गोत्र-प्रांत की भिन्नता, नए नए गुण देत |
बल बुद्धि विद्या प्रबल, साहस रूप समेत ||

सहज रूप से सफल हो, रावण का अभियान |
किया दूर रनिवास से, राजा को यह ज्ञान  ||

आई रानी अंग से,  लाया दूत बुलाय | 
कौशल्या के अंग से, अमृत बहता जाय ||

लगे तीन दिन गोद में, साइत शुभ आसन्न |
नया देश माता नई, हुई रीति संपन्न ||

जन्म-दायिनी छूटती, रोवे बुक्का-फार |
दिल का टुकड़ा सौंप दी, महिमा अपरम्पार ||

आठ माह की उम्र में, बदला घर परिवार |

 अंग देश को चल पड़ी, सरयू अवध विसार ||

कौला कौला सी चली, नव-कन्या के संग |


 जननी आती याद तो, करती कन्या तंग || 

कन्या का नामकरण 

कौशल्या दशरथ कहें, रुको और महराज |
अंगराज सह वर्षिणी, ज्यों चलते रथ साज ||

राज काज का हो रहा, मित्र बड़ा नुक्सान |
चलने की आज्ञा मिले, हमको काल्ह विहान ||

सुबह सुबह दो पालकी, दशरथ की तैयार |
अंगराज  रथ पर हुए, मय परिवार सवार ||

दशरथ विनती कर कहें, देते एक सुझाव |
सरयू  में  तैयार है,  बड़ी राजसी  नाव ||

धारा के संग जाइए, चंगा रहे शरीर |
चार दिनों की यात्रा, काहे होत अधीर ||

चंपानगरी  दूर  है, पूरे  दो सौ  कोस |
उत्तम यह प्रस्ताव है, दिखे नहीं कुछ दोष ||

पहुंचे उत्तम घाट पर, थी विशाल इक नाव |
नाविक-गण सब विधि कुशल, जाने नदी बहाव ||

बैठे सब जन चैन से, नाव बढ़ी अति मंद |
घोड़े-रथ तट पर चले, लेकर सैनिक चंद ||

धीरे धीरे गति बढ़ी, सीमा होती पार |
गंगा में सरयू मिली, संगम का आभार ||
 
चार घरी रूककर वहां, पूजें गंगा माय  |
सरयू को परनाम कर, देते नाव बढ़ाय ||

हर्ष और उल्लास का, देखा फिर अतिरेक |
ग्राम रास्ते में मिला, अंगदेश का एक || 

धरती पर उतरे सभी, आसन लिया जमाय |
नई कुमारी का करें, स्वागत जनगण आय |

लगे कुमारी  खुब प्रसन्न, कौला रखती ख्याल |
धरती पर धरती कदम, रानी रही संभाल ||

वैद्यराज की औषधी, वह गुणकारी लेप |
रस्ते भर मलती चली, तीन बार खुब घेप ||


नई वनस्पति फल नए, शीतल नई समीर |
खान-पान था कुल नया, नई नई तासीर || 

आठ माह की बालिका, मंद-मंद मुसकाय |
कंद-मूल फल प्रेम से, अंगदेश के खाय |

रानी के संग खेलती, बाला भूल कलेश ||
राज काज के काम कुछ, निबटा रहे नरेश |
विषम परिस्थित में अगर, भूले रिश्ते-नात ।  
जिन्दा रहने के लिए, गर करता आघात ।
गर करता आघात, क्षमा उसको कर देते ।
पर उनका क्या मित्र, प्राण जो यूँ ही लेते ।
भरे पेट का शौक, तड़पता प्राणी ताकें ।
दुष्कर्मी बेखौफ, मौज से पाचक फांके ।।
एक अनोखा वाद था,  ग्राम प्रमुख के पास |
बात सौतिया डाह की, विधवा करती नाश ||

सौतेला  इक  पुत्र  है, सौजा  के  दो  आप |
इक खाया कल बाघ ने, करती घोर विलाप  ||

रो रो कर वह बक रही, सौतेले का दोष |
यद्दपि वह घायल पड़ा, बेहद है अफ़सोस ||

ढर्रा बदलेगी नहीं,  रोज अड़ाये टांग ।
खांई में बच्चे सहित, ममता मार छलांग । 
'ममता' मार छलांग, भूलती मानुष माटी ।
धंसी 'मुलायम' भूमि, भागता मार गुलाटी ।
रविकर का अंदाज, लगेगा झटका कर्रा ।
बर्रा प्राकृति दर्प, बदल ना पाए ढर्रा ।।
जान लड़ा कर खुब लड़ा, हुआ किन्तु बेहोश |
बचा लिया इक पुत्र को, फिर भी न संतोष ||

बड़ी दिलेरी से लड़ा, देखा चौकीदार |
बड़े पुत्र को ले भगा, फिर भी वह खूंखार ||

सौजा को विश्वास है, देने को संताप |
सौतेले ने है किया, घृणित दुर्धुश पाप ||

घर न रखना चाहती, वह अब अपने साथ |
ईश्वर की  खातिर अभी, न्याय कीजिए नाथ ||


दालिम को लाया गया, हट्टा-कट्टा वीर |
चेहरे पर थी पीलिमा, घायल बहुत शरीर ||

सौजा से भूपति कहें, दालिम का अपराध |
प्रत्यक्ष निकसे ग्राम से, किन्तु रहे हितसाध ||

दालिम से मुड़कर कहें, जा जहाज में बैठ |
छू ले माता के चरण, बेमतलब मत ऐंठ ||

राजा पक्के पारखी,  है हीरा यह वीर |
पुत्री का रक्षक लगे, कौला की तकदीर ||

ममता में अंधी हुई, अपना पूत दिखाय |
स्वार्थ सिद्ध तृणमूल का, देश भाड़ में जाय |


देश भाड़ में जाय, खाय ले घर का बच्चा |

एक सूत्र जो पाय, चबाती  जाये कच्चा |

देती केंद्र हिलाय, कोप इक क्षण में कमता |
सब नौटंकी आय, चतुर माया से ममता  ।।


सेनापति से यूँ कहें, रुको यहाँ कुछ रोज |
नरभक्षी से त्रस्त जन, करिए उसकी खोज ||

जीव-जंतु जंगल नदी, सागर खेत पहाड़ |
बंदनीय हैं ये सकल, इनको नहीं उजाड़ ||

रक्षा इनकी जो करे, उसकी रक्षा होय |
शोषण गर मानव करे, जाए जल्द बिलोय ||

केवल क्रीडा के लिए, मत करिए आखेट |
भरता शाकाहार भी, मांसाहारी पेट ||

जीव जंतु वे धन्य जो, परहित धरे शरीर |
हैं निकृष्ट वे जानवर, खाएं उनको चीर ||

नरभक्षी के लग चुका, मुँह में मानव खून |
जल्दी उसको मारिये, जनगण पाय सुकून ||

अगली संध्या में करें, रजधानी परवेश |
अंग-अंग प्रमुदित हुआ, झूमा पूरा देश ||

गुरुजन का आशीष ले, मंत्री संग विचार |
नामकरण की शुभ तिथी, तय अगले बुधवार || 

नामकरण के दिन सजा, पूरा नगर विशेष |
ब्रह्मा-विष्णु देखते, नारद उमा महेश ||

महा-पुरोहित कर रहे, थापित महा-गणेश |
राजकुमारी आ गई, आये अतिथि विशेष ||

रानी माँ की गोद में, चंचल रही विराज |
टुकुर टुकुर देखे सकल, इत-उत होते काज ||

कौला दालिम साथ में, राजकुमारी पास |
हम दोनों कुछ ख़ास हैं, करते वे एहसास ||

महापुरोहित बोलते, हो जाओ सब शांत |
शान्ता सुन्दर नाम है, फैले सारे प्रांत ||

शान्ता -शान्ता कह उठा, वहाँ जमा समुदाय |
मात-पिता प्रमुदित हुए, कन्या खूब सुहाय ||

कार्यक्रम सम्पन्न हो, विदा हुए सब लोग |
पूँछे कौला को बुला, राजा पाय सुयोग ||

शान्ता की तुम धाय हो, हमें तुम्हारा ख्याल |
दालिम लगता है भला, रखे तुम्हे खुशहाल ||

तुमको गर अच्छा लगे, दिल में तेरे चाह |
सात दिनों में ही करूँ, तेरा उससे व्याह ||

कौला शरमाई तनिक, गई वहाँ से भाग |
दालिम की किस्मत जगी, बढ़ा राग-अनुराग ||

दोनों की शादी हुई, चले एक ही राह |
शान्ता के प्रिय बन रहे, राजा केर पनाह ||

सौम्या सृष्टी सोहिनी, माँ की मंजिल राह ।
सचुतुर, सुखदा, सुघड़ई, दुर्गे मिली अथाह । 
 दुर्गे मिली अथाह, बड़ी आभारी माता ।
ताकूँ अपना अक्श, कृपा कर सदा विधाता ।
हसरत हर अरमान, सफल देखूं इस दृष्टी ।
मंगल-मंगल प्यार, लुटाती सौम्या सृष्टी ।।

पोर-पोर में प्यार है, ममता अंश असीम ।
दर्शन तुझमे ही करूँ, अपने राम रहीम ।
सर्ग-2 समाप्त  

Saturday, 3 December 2011

भगवती शांता परम : सर्ग-1 अथ

सर्ग-1

अथ - शांता

Om 

सोरठा  
  वन्दऊँ श्री गणेश, गणनायक हे एकदंत |
जय-जय जय विघ्नेश, पूर्ण कथा कर पावनी ||1||
https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjIkyY2gM5VMkoXouwgR7KL7vhzQHI4G2CQ-oTLi3HeLya8p2-2jmLHOPRxNxOKADT8NfdsChhCdy3zsNoKaCwu5SKsXvVjiJ-73hQkRd_-JmbHcPsMdw0zM41Qv9iR_oyy9K54pNuI1_4/s1600/shree-ganesh.jpg
वन्दऊँ गुरुवर श्रेष्ठ, जिनकी किरपा से बदल,
यह गँवार ठठ-ठेठ, काव्य-साधना में रमा ||2||

गोधन को परनाम , परम पावनी नंदिनी |
गोकुल मथुरा धाम, गोवर्धन को पूजता ||3||
http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/8/8f/Ghaghra-River.png
वेद-काल का साथ, गंगा सिन्धु सरस्वती |
ईरानी हेराथ,  सरयू ये समकालिनी ||4||

राम-भक्त हनुमान,  सदा विराजे अवधपुर |
कर सरयू अस्नान, मोक्ष मिले अघकृत तरे ||5||
करनाली / घाघरा नदी का स्रोत्र 
करनाली का स्रोत्र, मानसरोवर के निकट |
करते जप-तप होत्र, महामनस्वी विचरते ||6||

File:Nepal map.png

क्रियाशक्ति भरपूर, पावन भू की वन्दना |

राम भक्ति में चूर, मोक्ष प्राप्त कर लो यहाँ ||7||
करनाली / घाघरा नदी के स्रोत्र  के पास मान-सरोवर
सरयू अवध प्रदेश, दक्षिण दिश में बस रहा |

यह विष्णु सन्देश, स्वर्ग सरीखा दिव्यतम ||8||

पूज्य अयुध  भूपाल, रामचंद्र के पूर्वज |
गए नींव थे डाल, बसी अयोध्या पावनी ||9||

दोहा 
शुक्ल पक्ष नवमी तिथी, पावन कातिक मास |
करो नगर की परिक्रमा, मन श्रृद्धा विश्वास ||

गुणों और आदर्श को, अपने ह्रदय उतार |
श्री राम के सामने, लम्बी लगे कतार |

  पुरुषोत्तम सरयू गए, होते अंतर्ध्यान |
त्रेता युग का अवध तब, हुआ पूर्ण वीरान |

कुश के सद्प्रयास से, बसी अयोध्या वाह |
फिर से सदगृहस्थ जन, चले अवध की राह |

 कृष्ण रुक्मणी भी यहाँ, आये द्वापर काल |
पुरुषोत्तम के चरण में, गये पुष्प थे डाल ||

कलयुग में फिर से बसी, नगरी अवध महान |
पुन: विक्रमादित्य से, बढ़ी नगर की शान ||

देवालय फिर से बने, बने सरोवर कूप |
स्वर्ग सरीखा लग रहा, अवध नगर का रूप ||
Janmabhoomi
राम-कोट  

सोरठा 
माया मथुरा साथ, काशी कांची अवंतिका |
महामोक्ष का पाथ, श्रेष्ठ अयोध्या द्वारिका ||10||

अंतरभू  प्रवाह, सरयू सरसर वायु सी
संगम तट निर्वाह,  पूज घाघरा शारदा ||11||
http://www.pilgrimageindia.net/hindu_pilgrimage/images/ayodhya1.jpg 
सरयू जी 
पुरखों का इत वास, तीन कोस बस दूर है |
बचपन में ली साँस, यहीं किनारे खेलता ||12||


परिक्रमा श्री धाम, चौरासी  कोसी  मिले |
पटरंगा मम ग्राम, होय सदा हर फाल्गुन ||13||
 
थे दशरथ महराज, उन्तालिस निज वंश के |

रथ दुर्लभ अंदाज, दशों दिशा में हांक लें ||14||

File:Parijat-tree-at-Kintoor-Barabanki-002.jpg 

पारिजात (किन्नूर)

पटरंगा से 3 कोस  
पिता-श्रेष्ठ 'अज' भूप, असमय स्वर्ग सिधारते |  
 निकृष्ट कथा कुरूप, चेतो माता -पिता सब ||15||

दशरथ बाल-कथा --

aish
दोहा
इंदुमती के प्रेम में, भूपति अज महराज |
लम्पट विषयी जो हुए, झेले राज अकाज ||1||
दीखते हैं मुझे दृश्य सब मनोहारी 
कुसुम कलिकाओं से सुगंध तेरी आती है

कोकिला की कूक में भी स्वर की सुधा सुन्दर 
प्यार की मधुर टेर सारिका सुनाती है

देखूं शशि छबि या निहारूं अंशु सूर्य के -
रंग छटा उसमे तेरी ही दिखाती है |
 
कमनीय कंज कलिका विहस 'रविकर'
तेरे रूप-धूप का सुयश फैलाती है
गुरु वशिष्ठ की मंत्रणा, सह सुमंत बेकार |
इंदुमती के प्यार ने, दूर किया  दरबार ||2||


क्रीड़ा सह खिलवाड़ ही, परम सौख्य परितोष |

सुन्दरता पागल करे, मानव का क्या दोष ||3||


अति सबकी हरदम बुरी, खान-पान-अभिसार |

क्रोध-प्यार बडबोल से,  जाय  जिंदगी  हार ||4||

 

झूले  मुग्धा  नायिका, राजा  मारें  पेंग |
वेणी लागे वारुणी,  दिखा रही वो  ठेंग ||5||

राज-वाटिका  में  रमे, चार पहर से आय |
आठ-मास के पुत्र को,  दुग्ध पिलाती धाय ||6||

नारायण-नारायणा,  नारद  निधड़क  नाद |
अवधपुरी का आसमाँ, स्वर्गलोक के बाद ||7||

वीणा से माला गिरी, इंदुमती पर  आय |
ज्योत्सना वह अप्सरा, जान हकीकत जाय ||8||

एक पाप का त्रास वो, यहाँ रही थी भोग |
स्वर्ग-लोक नारी गई, अज को परम वियोग ||9||

माँ का पावन रूप भी, सका न उसको रोक |
आठ माह के लाल को, छोड़ गई इह-लोक ||10||
विरह वियोगी महल में, कदम उठाया गूढ़ |
भूल पुत्र को कर लिया, आत्मघात वह मूढ़ ||11|

माता की ममता छली, करता पिता अनाथ |
रोय-रोय हारा शिशू , पटक-पटक के माथ ||12||

क्रियाकर्म  होता  रहा, तेरह दिन का शोक |
अबोध शिशु की मुश्किलें, रही थी बरछी भोंक ||13||  

आंसू बहते अनवरत, गला गया था बैठ |
राज भवन में थी सदा, अरुंधती की पैठ ||14|

पत्नी पूज्य वशिष्ठ की, सादर उन्हें प्रणाम |
 एक मास तक पालती, माता सम अविराम ||15||
File:Batu Caves Kamadhenu.jpg 
नंदिनी की माँ कामधेनु 
 महामंत्री थे सुमंत, गए गुरू के पास |
लालन-पालन की किया, कुशल व्यवस्था ख़ास ||16||

महागुरू मरुधन्व के, आश्रम में तत्काल |
 गुरु-आज्ञा पा ले गए, व्याकुल दशरथ बाल ||17||

जहाँ नंदिनी पालती, बाला-बाल तमाम |
दुग्ध पिलाती प्रेम से, भ्रातृ-भाव  पैगाम ||18||

माँ कामधेनु की पुत्री, करती इच्छा पूर |
देवलोक की नंदिनी, इस आश्रम की नूर ||19||

दक्षिण कोशल सरिस था, उत्तर कोशल राज |
सूर्यवंश के ही उधर, थे भूपति महराज ||20||

राजा अज की मित्रता, का उनको था गर्व |
 दुर्घटना  से थे दुखी, राजा-रानी सर्व ||21||

अवधपुरी आने लगे, ज्यादा कोसलराज |
राज-काज बिधिवत चले, करती परजा नाज ||22||

धीरे-धीरे बीतता, दुःख से बोझिल काल |
राजकुंवर बढ़ते चले, बीत गया इक साल ||23||

दूध नंदिनी का पिया, अन्प्राशन की बेर |
आश्रम से वापस हुए, फैला महल उजेर ||24||

ठुमुक-ठुमुक कर भागते, छोड़-छाड़ पकवान |
दूध नंदिनी का पियें, आता रोज विहान ||25||

उत्तर कोशल झूमता, राजकुमारी पाय |
पिताश्री भूपति बने, फूले नहीं समाय ||26||

पुत्री को लेकर करें, अवध पुरी की सैर |
राजा-रानी नियम से, लेने आते खैर ||27||

नामकरण था हो चुका,  धरते गुण अनुसार |
दशरथ कौशल्या कहें, यह अद्भुत ससार ||28||

कुछ वर्षों के बाद ही, फिर से राजकुमार |
विधिवत शिक्षा के लिए, गए गुरु आगार ||29||

अच्छे योद्धा बन गए, महाकुशल बलवान|
दसो दिशा रथ हांकले, बने अवध की शान ||30||

शब्द-भेद संधान से, गुरु ने किया अजेय |
अवधपुरी उन्नत रहे, बना एक ही ध्येय || 31||

राजतिलक विधिवत हुआ, आये कोशल-राज |
कौशल्या भी साथमे, हर्षित सकल समाज ||32||

बचपन का वो खेलना, आया फिर से याद |
देखा देखी ही हुई, खिंची रेख मरजाद ||33||

रावण, कौशल्या और दशरथ  
दशरथ युग में ही हुआ, दुर्धुश भट बलवान |
पंडित ज्ञानी जानिये, रावण  बड़ा महान ||1|

बार - बार कैलाश पर,  कर शीशों का दान |
छेड़ी  वीणा  से  मधुर, सामवेद  की  तान ||2||
 
भण्डारी ने भक्त पर, कर दी कृपा  अपार |
कई शक्तियों ने किया,  पैदा बड़े विकार ||3||

पाकर शिव वरदान वो, पहुंचा ब्रह्मा पास |
श्रृद्धा से की  वन्दना, की  पावन अरदास ||4||

ब्रह्मा ने परपौत्र को, दिए  कई वरदान |
ब्रह्मास्त्र भी सौंपते, सब शस्त्रों की शान ||5||

शस्त्र-शास्त्र का हो धनी, ताकत से भरपूर |
मांग अमरता का रहा, वर जब रावन क्रूर ||6||

ऐसा तो संभव नहीं, मन की गांठें खोल |
मृत्यु सभी की है अटल, परम-पिता के बोल ||7||

कौशल्या का शुभ लगन, हो दशरथ के साथ |
दिव्य-शक्तिशाली सुवन,  काटेगा दस-माथ ||

रावण थर-थर कांपता, क्रोधित हुआ अपार |
प्राप्त  अमरता  करूँ मैं, कौशल्या को मार ||8||

बोली मंदोदरी सुनो, नारी हत्या पाप |
झेलोगे कैसे भला,  भर जीवन संताप ||9||

तब  उसके  कुछ  राक्षस,  पहुँचे  सरयू तीर | 
कौशल्या का अपहरण, करके शिथिल शरीर ||10||

बंद पेटिका में किया, दिया था जल में डाल |
राजा दशरथ देख के, इनके सकल बवाल ||11||

राक्षस गण से जा भिड़े, चले तीर तलवार |
भगे पराजित राक्षस,  कूदे फिर जलधार ||12||

आगे बहती पेटिका, पीछे भूपति वीर |
शब्द भेद से था पता, अन्दर एक शरीर ||13||

बहते बहते पेटिका, गंगा जी में जाय |
जख्मी दशरथ को इधर, रहा दर्द अकुलाय ||14||

रक्तस्राव था हो रहा, थककर होते चूर |
गिद्ध जटायू देखता, राजा  है  मजबूर  ||15||
http://ecologyadventure2.edublogs.org/files/2011/04/turkey-vulture-sc5xey.jpg
अर्ध मूर्छित भूपती, घायल फूट शरीर |
औषधि से उपचार कर, रक्खा गंगा तीर ||16||

दशरथ आये होश में, असर किया वो लेप |
गिद्ध राज के सामने, कथा कही संक्षेप ||17||

कहा जटायू ने उठो, बैठो मुझपर आय |
पहुँचाउंगा शीघ्र ही, राजन उधर उड़ाय ||18||

बहुत दूर तक ढूँढ़ते, पहुँचे सागर पास |
पाय पेटिका खोलते, हुई बलवती आस ||19||

कौशल्या बेहोश थी, मद्धिम पड़ती साँस |
नारायण जपते दिखे, नारद जी आकाश ||20||
बड़े जतन करने पड़े, हुई तनिक चैतन्य |
सम्मुख प्रियजन पाय के, राजकुमारी धन्य ||21||

नारद विधिवत कर रहे, सब वैवाहिक रीत |
दशरथ को ऐसे मिली, कौशल्या मनमीत ||22||
नव-दम्पति को ले उड़े,  गिद्धराज खुश होंय |
नारद जी चलते बने, सुन्दर कड़ी पिरोय ||23||
jaimala
अवधपुरी सुन्दर सजी, आये कोशलराज |
दोहराए फिर से गए, सब वैवाहिक काज ||24||
 रावण के क्षत्रप 
सोरठा
रास रंग उत्साह,  अवधपुरी में खुब जमा |
उत्सुक देखे राह, कनक महल सजकर खड़ा ||

 
चौरासी विस्तार, अवध नगर का कोस में |
अक्षय धन-भण्डार,  हृदय कोष सन्तोष धन |
पांच कोस विस्तार, कनक भवन के अष्ट कुञ्ज |
इतने ही थे द्वार, वन-उपवन बारह सजे ||

 
शयन केलि श्रृंगार,  भोजन और स्नान कुञ्ज |
झूलन कुञ्ज बहार, अष्ट कुञ्ज में थे प्रमुख ||

 
चम्पक विपिन रसाल, पारिजात चन्दन महक |
केसर कदम तमाल, नाग्केसरी वन विचित्र ||

लवंगी-कुंद-गुलाब, कदली चम्पा सेवती |
  वृन्दावन नेवार, उपवन जूही माधवी || 

घूमें सुबहो-शाम, कौशल्या दशरथ मगन |
इन्द्रपुरी सा धाम, करें देवता ईर्ष्या ||

रावण के उत्पात, उधर झेलते साधुजन |
लगा के बैठा घात, कैसे रोके शत्रु-जन्म ||

मायावी इक दास, आया विचरे अवधपुर |
करने सत्यानाश, कौशल्या के हित सकल ||

चार दासियों संग, कौशल्या झूलें मगन |
उपवन मस्त अनंग, मायावी आया उधर ||

धरे सर्प का रूप, शाखा पर जाकर डटा |
पड़ी तनिक जो धूप, सूर्यदेवता ताड़ते ||

महा पैतरेबाज, सिर पर वो फुफ्कारता |
दशरथ सुन आवाज, शब्द-भेद कर मारते ||  

रावण के षड्यंत्र, यदा कदा होते रहे |
जीवन के सद-मंत्र, सूर्य-वंश आगे चला ||

गुरु वशिष्ठ का ज्ञान, सूर्य देव के तेज से | 
अवधपुरी की शान, सदा-सर्वदा बढ़ रही ||

रावण रहे उदास, लंका सोने की बनी  |
करके कठिन प्रयास, धरती पर कब्ज़ा करे ||

जीते जो भू-भाग, क्षत्रप अपने छोड़ता |
 निकट अवध संभाग, खर दूषण को सौंप दे || 

खर दूषण बलवान, रावण सम त्रिशिरा विकट |
डालें नित व्यवधान, गुप्त रूप से अवध में ||

त्रिजटा शठ मारीच, मठ आश्रम को दें जला |
भूमि रक्त से सींच, हत्या करते साधु की || 

कुत्सित नजर गढ़ाय, राज्य अवध को ताकते |
 खबर रहे पहुँचाय, आका लंका-धीश को ||

गए बरस दो बीत, कौशल्या थी मायके |
पड़ी गजब की शीत, 'रविकर' छुपते पाख भर ||

जलने लगे अलाव, जगह-जगह पर राज्य में |
दशरथ यह अलगाव, सहन नहीं कर पा रहे ||

भेजा चतुर सुमंत्र, विदा कराने के लिए |
रचता खर षड्यंत्र, कौशल्या की मृत्यु हित ||


 
 असली घोडा मार, लगा स्वयं रथ हाँकने ||
कौशल्या असवार, अश्व छली लेकर भगा ||

धुंध भयंकर छाय, हाथ न सूझे हाथ को |
रथ तो भागा जाय, मंत्री मलते हाथ निज ||

कौशल्या हलकान, रथ की गति अतिशय विकट |
रस्ते सब वीरान, कोचवान ना दीखता ||

समझ गई हालात, बंद पेटिका सुमिर कर |
ढीला करके गात, जगह देखकर कूदती ||

लुढ़क गई कुछ दूर, झाडी में जाकर छुपी ||
चोट लगी भरपूर, होश खोय बेसुध पड़ी ||

मंत्री चतुर सुजान, दौडाए सैनिक सकल |
देखा पंथ निशान, सैनिक ने सौभाग्य से ||

लाया वैद्य बुलाय, सेना भी आकर जमी |
नर-नारी सब आय, हाय-हाय करने लगे ||

खर भागा उत जाय, मन ही मन हर्षित भया |
अपनी सीमा आय, रूप बदल करके रुका ||

रथ खाली अफ़सोस, गिरा भूमि पर तरबतर |
रही योजना ठोस, बही पसीने में मगर ||

रानी डोली सोय, अर्ध-मूर्छित लौटती |
वैद्य रहे संजोय, सेना मंत्री साथ में ||

दशरथ उधर उदास, देरी होती देखकर |
भेजे धावक ख़ास, समाचार लेने गए ||
       रावण का गुप्तचर   
दोहे
असफल खर की चेष्टा, होकर के गमगीन |
लंका जाकर के कहे,  चेहरा लिए मलीन ||

रावण शाबस बोलता, काहे  होत उदास |
कौशल्या के गर्भ का, करके पूर्ण विनाश ||
File:Demon Yakshagana.jpg
खर बोला भ्राता ज़रा, खबर कहो समझाय |
यह घटना कैसे  हुई, जियरा तनिक जुड़ाय ||

रानी रथ से कूद के, खाय चोट भरपूर |
तीन माह का भ्रूण भी, हुआ स्वयं से चूर ||

खर के संग फिर गुप्तचर, भेजा सागर पार |
वह सुग्गासुर जा जमा, शुक थे जहाँ अपार ||
हरकारे वापस इधर, आये दशरथ पास |
घटना सुनकर हो गया, सारा अवध उदास ||

गुरुकुल में शावक मरा, हिरनी आई याद |
अनजाने घायल हुई, चखा दर्द का स्वाद ||

गुरु वशिष्ठ की अनुमती, तुरत गए ससुरार |
कौशल्या को देखते, नैना छलके प्यार ||

संक्रान्ति से सूर्य ने, दिए किरण उपहार |
अति-ठिठुरन थमने लगी, चमक उठा संसार ||

दवा-दुआ से हो गई, रानी जल्दी ठीक |
दशरथ के सत्संग से, घटना भूल अनीक ||

विदा मांग कर आ गए, राजा-रानी साथ |
चिंतित परजा झूमती, होकर पुन: सनाथ ||
http://www.shreesanwaliyaji.com/blog/wp-content/uploads/2011/02/vasant-panchami-saraswat-sanwaliyaji_bhadsoda.jpg
धीरे धीरे सरकती, छोटी होती रात |
 हवा बसंती बह रही, जल्दी होय प्रभात |
दिग-दिगंत बौराया | मादक  बसंत आया ||
तोते सदा पुकारे | पर मैना दुत्कारे ||
काली कोयल कूके | लोग होलिका फूंके || 
सरसों पीली फूली | शीत बची मामूली  ||
भौरां मद्धिम गाये  | तितली मन बहलाए ||
भाग्य हमारे जागे | दुःख-दारिद्र, भागे || 
पीली सरसों फूलती, हरे खेत के बीच |
 कृषक निराई कर रहे, रहे खेत कुछ सींच ||
तरह तरह की जिंदगी, पक्षी कीट पतंग |
पशू प्रफुल्लित घूमते, नए सीखते ढंग ||


कौशल्या रहती मगन, वन-उपवन में घूम ||
धीरे धीरे भूलती, गम पुष्पों को चूम ||

कौशल्या के गर्भ की, कैसे रक्षा होय |
दशरथ चिंता में पड़े, आँखे रहे भिगोय ||

गिद्धराज की तब उन्हें, आई बरबस याद |
तोते कौवे की बढ़ी, महल पास तादाद ||

कौशल्या जब देखती, गिद्धराज सा गिद्ध |
याद जटायू को करे, कार्य करे जो सिद्ध ||

यह मोटा भद्दा दिखे, आत्मीय वह रूप |
यह घृणित हरदम लगे, उसपर स्नेह अनूप ||

गिद्ध दृष्टि रखने लगा, बदला बदला रूप |
अलंकार त्यागा सभी, बनकर रहे  कुरूप ||

केवल दशरथ जानते, होकर रहें सचेत |

अहित-चेष्टा में लगे, खर-दूषण से प्रेत ||

सुग्गासुर अक्सर उड़े, कनक महल की ओर |

देख जटायू को हटे, हारे मन का चोर ||

एक दिवस रानी गई, वन रसाल उल्लास |

सुग्गासुर आया निकट, बाणी मधुर सुभाष ||

माथे टीका शोभता, लेता शुक मनमोह |

ऊपर से अतिशय भला, मन में राखे द्रोह ||

रानी वापस आ गई, आई फिर नवरात |
नव-दुर्गा को पूजती, एक समय फल खात ||

स्नानकुंज में रोज ही, प्रात: करे नहान |

भक्तिभाव से मांगती, माता सम सन्तान ||

सुग्गासुर की थी नजर, आ जाता था पास |
 स्वर्ण-हार हारक उड़ा, झटपट ले आकाश ||
gold necklace
सुनकर चीख-पुकार को, वो ही भद्दा गिद्ध ||
शुक के पीछे लग गया, होकर अतिशय क्रुद्ध ||

जान बचाकर शुक भगा, था पक्का अय्यार ||

छुपा सुबाहु के यहाँ, पीछे छोड़ा हार ||

वापस पाकर हार को, होती हर्षित खूब |

राजा का उपहार वो, गई प्यार में डूब ||
Jawalamukhi Kanya Puja
 नवमी को व्रत पूर्ण कर, कन्या रही खिलाय  |
 चरण धोय कर पूजती, पूरी-खीर जिमाय ||

'रविकर' दिन का ताप अब, दारुण होता जाय |

पाँव इधर भारी हुए, रानी फिर सकुचाय ||

  सर्ग-1 : समाप्त